लेख – धीरज नागराज

आज का भारत राजनीति के स्तर पर जिस तरह से गिरावट देख रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ती भीड़ एक ओर जहां राजनीतिक संघर्ष और विचारधारा के उत्थान को प्रदर्शित करती है, वहीं दूसरी ओर यह विडंबनाओं और आत्म-निर्भरता की कमी का प्रतीक भी बन चुकी है। एक ओर जहां नेताओं की भाषा शैली का स्तर न केवल अशोभनीय होता जा रहा है, वहीं उनकी कृतियां और अतीत भी हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या यह राजनीति वास्तव में देशहित में है?
राजनीतिक नेतृत्व और अतीत के विडंबनाएं
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के जैसे नेता, जिनका राजनीतिक इतिहास किसी भी सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रेरणादायक नहीं कहा जा सकता, आज देश के नागरिकों को यह सिखा रहे हैं कि कैसे देश को एक नई दिशा दी जाए। लेकिन क्या यह सही है कि हम उन नेताओं की बातों को सुनें जिनके दादा परदादा केवल 10 प्रतिशत वोट लेकर प्रधानमंत्री बने और जो भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हुए हैं?
क्या यह सही है कि ऐसे नेता जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अपने कद को बढ़ाने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं का लगातार अपमान किया, आज देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं पर उंगली उठा रहे हैं? इस पर विचार करना आवश्यक है, खासकर तब जब भ्रष्टाचार, चारा घोटाला और आपसी टकराव उनके राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा रहे हैं।

हिंदू समाज की मानसिकता का संकट
बिहार, बंगाल, केरल, असम और अन्य राज्यों में जहां अल्पसंख्यकों की बढ़ती संख्या हिंदू समाज के लिए चिंता का विषय बन चुकी है, वहां राजनीति ने समाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है। इस समय में भारत के हिंदू समाज का जमीर छोटे-छोटे प्रलोभनों में गिर चुका है। हमें यह समझना चाहिए कि जब धर्म और संस्कृति को छोड़कर केवल वोट बैंक की राजनीति होती है, तब समाज का संतुलन बिगड़ता है और वह अपनी जड़ों से दूर होता जाता है।
आज यदि हिंदू समाज अपनी कमजोरी को नजरअंदाज करता है, तो यह भविष्य में भारत के लिए एक गंभीर संकट बन सकता है। हमें यह याद रखना चाहिए कि यदि हमें अपने धर्म, संस्कृति और पहचान की रक्षा करनी है तो हमें पहले अपनी एकता और जागरूकता को बढ़ाना होगा।

धर्मनिरपेक्षता का दुरुपयोग
राजनीतिक दलों द्वारा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू समाज को अनदेखा किया जा रहा है। जबकि देश में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर हर पार्टी और हर नेता की प्रतिक्रिया तेज होती है, वहीं हिंदू समाज के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर अक्सर चुप्पी साधी जाती है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे दल जो ‘वोट बचाओ’ यात्रा निकालते हैं, दरअसल वे इस यात्रा के जरिए भारत में घुसपैठियों को संरक्षण देने की कोशिश कर रहे हैं। इन दलों द्वारा बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के भारत में बसने के प्रयास सीधे तौर पर देश की आंतरिक सुरक्षा और सांस्कृतिक धारा के लिए खतरे का कारण बन रहे हैं।
समाज का जागरण और जिम्मेदारी
आज जब हम सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं और जब हर बात सिर्फ एक क्लिक दूर है, फिर भी अगर हम आंखों पर पट्टी बांधे बैठे रहें और अपनी जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करें, तो न केवल हम अपने भविष्य को खतरे में डालेंगे बल्कि अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अस्मिता को भी खो देंगे। अगर यही स्थिति रही, तो भविष्य में हिंदू समाज अल्पसंख्यक बन सकता है, और तब हमें किसी अन्य देश में शरण लेने का भी अवसर नहीं मिलेगा।

निष्कर्ष
हमें इतिहास से शिक्षा लेकर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता को बनाए रखना होगा। हमे उन नेताओं से दूर रहना होगा जो हमारे धर्म और संस्कृति का अपमान करते हैं, जिन्होंने हमारे रीति-रिवाजों को नकारा है और जिनका कार्य केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित है। यदि हिंदू समाज जागरूक नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में हमें खतरों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, हमें अपनी सोच को साफ करना होगा और सही नेतृत्व का चयन करना होगा जो देश और समाज की भलाई के लिए काम करें।
लेख – धीरज नागराज

