– एक किसान की व्यथा, एक देश की सच्चाई
लेख – धीरज नागराज

देश ने हाल ही में अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह अवसर जहां एक ओर गर्व और गौरव का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा करता है — क्या वास्तव में हम आज़ाद हैं? विशेषकर हमारे देश का अन्नदाता, जिसे हम बड़े सम्मान से “किसान” कहते हैं, क्या वह आज़ादी के मायने समझ पा रहा है?
आज़ादी के इन 79 वर्षों में भारत ने विज्ञान, तकनीक, रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रगति की है, लेकिन दुर्भाग्यवश किसान की हालत जस की तस बनी हुई है — बल्कि कई मायनों में और भी बदतर हो गई है। जिस किसान ने देश को खाद्य सुरक्षा दी, अब वह खुद दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है।

मूल्य बढ़े, लेकिन किसानों की उपज का मूल्य नहीं
पिछले 20 वर्षों में हर वस्तु के दाम 10 गुना से लेकर 100 गुना तक बढ़ गए हैं। चाहे वह नमक हो या तेल, कपड़े हों या दवाइयाँ, हर चीज़ महंगी हो चुकी है। लेकिन किसान की उपज — गेहूं, सोयाबीन, प्याज़, लहसुन — आज भी लगभग उसी दाम पर बिक रही है जिस पर दो दशक पहले बिकती थी।
उदाहरण के लिए, सोयाबीन 20 साल पहले 3,000 से 4,000 रुपये प्रति क्विंटल बिकती थी — आज भी वही दाम है। गेहूं का मूल्य 1,500 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल था, और आज भी वही है। इस बीच, खेती की लागत कई गुना बढ़ चुकी है — खाद, बीज, कीटनाशक, डीज़ल, मजदूरी और बिजली का खर्च आसमान छू रहा है।
प्राकृतिक आपदाएं और बीमार फसलें: दोहरी मार
पिछले दो वर्षों में लगातार प्राकृतिक आपदाओं और फसलों में बीमारियों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। इस वर्ष सोयाबीन में नई बीमारी लग गई है, लहसुन और प्याज की फसल से किसानों को उम्मीद थी, लेकिन बाजार में उनके दाम कौड़ियों के भाव बिक रहे हैं। लाखों रुपये की लागत लगाने के बाद भी किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहा है।

राजनीतिक वादे बनाम जमीनी सच्चाई
हर सरकार किसानों के हित की बात करती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात नहीं बदलते। ₹6000 सालाना की पीएम किसान सम्मान निधि योजना या प्राकृतिक आपदा राहत बीमा की मामूली राशि — क्या इतने पैसों में एक किसान परिवार अपना जीवन चला सकता है? कई किसानों को तो यह बीमा राशि भी नहीं मिली, और जिनके खाते में आई, वह भी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई।
युवा पीढ़ी खेती से दूर क्यों?
आज किसान अपने बच्चों से कह रहा है — “खेती मत करना।” यह कितनी दुखद स्थिति है कि जो काम देश की रीढ़ है, वही अब भविष्य के लिए हानिकारक मान लिया गया है। कारण स्पष्ट हैं — खेती अब लाभ का सौदा नहीं रही। किसान मेहनत करता है, फसल उगाता है, लेकिन मंडी में उसे ठगा जाता है।
भूमाफिया किसानों की ज़मीनें कौड़ियों के दाम खरीदकर वहाँ कॉलोनियाँ और फैक्ट्रियाँ बना रहे हैं। खेती योग्य भूमि घट रही है, और किसान शहर की ओर पलायन कर रहा है — मज़दूरी करने।
अगर किसान अन्न उगाना बंद कर दे तो?
यह सवाल जितना सरल है, इसका जवाब उतना ही डरावना। अगर किसान खेती करना छोड़ दे, तो सिर्फ एक साल में ही देश को अन्न संकट झेलना पड़ेगा। जिस दिन खेत खाली हो गए, उसी दिन देश की थाली भी खाली हो जाएगी।
आज जब टमाटर, प्याज़, या गेहूं के भाव थोड़े भी बढ़ते हैं तो मीडिया, सरकार और जनता में हाहाकार मच जाता है। लेकिन जब किसान की आँखों में आँसू होते हैं, जब वह कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या करता है, तो कोई नहीं पूछता — क्यों?
क्या समाधान है?
सरकार और समाज दोनों को अब सिर्फ भाषणों से आगे बढ़कर ठोस कार्यवाही करनी होगी:
फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागत के अनुसार तय किया जाए और सुनिश्चित रूप से मिले।
कृषि बीमा योजनाओं को पारदर्शी और भरोसेमंद बनाया जाए।
भंडारण और विपणन प्रणाली को मज़बूत किया जाए, ताकि किसान बिचौलियों के चंगुल से मुक्त हो।
आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, और सस्ती लागत वाली खेती को बढ़ावा दिया जाए।
खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाया जाए, न कि केवल जीविका का साधन।
निष्कर्ष
किसान कभी किसी से भीख नहीं मांगता। वह चाहता है कि उसकी मेहनत की सही कीमत मिले। वह देश को अन्न देता है, जीवन देता है — और अब वह खुद जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है।
अगर किसान आत्महत्या ना करे, तो फिर क्या करे?
इस सवाल का जवाब हमें — सरकार को, समाज को, और हर नागरिक को — देना ही होगा।
वरना एक दिन यही किसान खेती छोड़ देगा और तब देश की थाली में अन्न नहीं, पछतावा परोसा जाएगा।
जय जवान, जय किसान।
एक किसान की ओर से, उसकी पीड़ा और उसका सच।
लेख – धीरज नागराज

